छिंदवाड़ा जिले के मैनीखापा सहित आसपास के गांवों से प्रतिदिन सीताफल की आवक
Betul Samachar/मुलताई। नगर में इन दिनों सीताफल की बहार आई हुई है और बसस्टेंड से लेकर पुराने बेरियर नाके तक जगह जगह सीताफल लिए आदिवासी समाज के महिला पुरूष एवं बच्चे बैठे नजर आ रहे हैं। सीताफल का विशेष स्वाद होने के कारण बड़ी संख्या में प्रतिदिन लोग सीताफल खरीद रहे हैं वहीं बाहर से आए हुए लोग भी टोकनियों से कच्चे सीताफल ले जा रहे हैं। नगर में आसानी से उपलब्ध होने वाले मौसमी सीताफल को बाजार तक लाने के लिए आदिवासी समाज के महिला पुरूषों के द्वारा कड़ी मेहनत एवं मशक्कत की जाती है। नगर में आने वाले अधिकांश सीताफल छिंदवाड़ा जिले के मैनीखापा सहित आसपास के गांव से लाए जाते हैं। आदिवासी महिला सजना इरपाचे ने बताया कि प्रायः सीताफल खेतों में लगे पेड़ों से लाए जाते हैं जिसके लिए पहले कच्चे सीताफल पेड़ों से तोड़े जाते हैं जिसके बाद उन्हे खेतों से घर लाकर टोकनियों अथवा कैरेट में भरकर मुख्य मार्ग तक लाया जाता है। इसके बाद बसों सहित अन्य साधनों से सीताफल मुलताई के बाजार तक लाए जाते हैं जिसके बाद उनकी बिक्री की जाती है। बाजार में सीताफल छोटी बड़ी टोकनियों में रखकर बेचे जाते हैं जो कच्चे होते हैं लेकिन एक दो दिन में ही सीताफल पक जाते हैं। कई स्थानों पर सीताफल पालिथिन में भरकर बेचे जाते हैं लेकिन अधिकांश सीताफल टोकनियों में ही बिकते हैं।
नही मिलता मेहनत के हिसाब से भाव
सीताफल विक्रेता आदिवासी महिलाओं ने बताया कि जितनी मेहनत मशक्कत सीताफल को खेत अथवा जंगल से बाजार तक लाने में लगती है उतना भाव नही मिल पाता। इसका प्रमुख कारण यह भी है कि सीताफल मौसमी होता है तथा इसकी फसल एक साथ आकर कुछ ही दिनों में खत्म भी हो जाती है जिससे बाजार में बड़ी तादाद में सीताफल आ जाते हैं जहां प्रतिस्पर्धा के कारण औने पौने दामों में सीताफल बेचना पड़ता है। एक बार पकने के बाद सीताफल खराब होने लगते हैं इसलिए पकने के पहले सीताफल को बेचना आवश्यक होता है जिसके लिए एक बार बाजार लेकर आए सीताफल को वापस नहीं ले जाया जाता तथा शाम तक किसी भी तरह किसी भी भाव में सीताफल बेच दिए जाते हैं।
Read Also: मेले की रूपरेखा तैयार करने मैदान में पहुंचे नपा के जनप्रतिनिधिगण
50 से लेकर 100 रूपए टोकनी तक बिकते हैं सीताफल
सीताफल की बिक्री वर्षों से आदिवासी समाज के लोग टोकनी में करते आ रहे हैं। छोटी, मध्यम तथा बड़ी टोकनियों में सीताफल उसकी पत्तियों के साथ रखे जाते हैं तथा 50 रूपए से लेकर 100 रूपए के बीच टोकनियों के सीताफल बेच दिए जाते हैं। कई बार मोलभाव के कारण इससे भी कम में सीताफल बेचे जाते हैं जिससे बाजार में आने तक लगने वाला खर्च भी निकालना मुश्किल हो जाता है। महिलाओं ने बताया कि बड़ी संख्या में एक साथ सीताफल बाजार में आने से जिसे जैसा भाव मिलता है सीताफल बेच दिए जाते हैं क्योंकि तमाम खर्च लगाने के बाद सीताफल वापस नही ले जाए जा सकते।
सीताफल को टैक्स वसूली से मुक्त रखने की मांग
सीताफल को बाजार तक लाने में जहां भारी मेहनत लगती है वहीं पल पल पर इसके लिए पैसे भी चुकाने पड़ते हैं सीताफल बेचने वाली महिलाओं ने बताया कि बस में स्वयं की टिकिट के साथ बस चालकों के अनुसार भाड़ा देना पड़ता है इसके लिए भी जद्दोजहद करना पड़ता है। इसके बाद बाजार में नगर पालिका द्वारा भी टोकनी एवं कैरेट के हिसाब से वसूली की जाती है जिसे देना पड़ता है। इसके बाद पूरे दिन धूप में बैठना पड़ता है तथा चिल्लर खर्च भी होता है बावजूद इसके यह गारंटी नही होती कि सीताफल बिक जाएंगे। इसके लिए कई बार न्यूनतम मूल्य पर सीताफल बेचना पड़ता है। ऐसी स्थिति में भारी मेहनत मशक्कत तथा लागत के बाद भी सीताफल विक्रेता अपेक्षित कमाई नहीं कर पाते जिससे जागरूक नागरिकों द्वारा सीताफल को वसूली से मुक्त रखने की मांग की जा रही है ताकि आदिवासी समाज के लोगों को मेहनत का ही पूरा पैसा मिल सके।

