Betul Ki Khabar: रासायनिक खेती की तुलना में पारंपरिक खेती फायदेमंद

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                                        महाविद्यालय में 'विरासत से विकास पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का समापन

Betul Ki Khabar/मुलताई। शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में अर्थशास्त्र विभाग एवं आंतरिक गुणवत्ता सुनिश्चयन प्रकोष्ठ के संयुक्त तत्वावधान में विरासत से विकास भारतीय ज्ञान परंपरा – संभावनाएं एवं चुनौतियां विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का गुरुवार समापन हुआ। कार्यक्रम के दूसरे और अंतिम दिन की शुरुआत महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. कमलेश कुमार सरिया एवं जनभागीदारी समिति के अध्यक्ष श्री जयेश संघवी द्वारा माँ सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित कर की गई। इस अवसर पर देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए विषय-विशेषज्ञों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों और युवा किसानों ने अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए। कार्यक्रम में पधारे अतिथियों ने श्री अन्न के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला डॉ. समित माहोरे निदेशक, आजीवन अध्ययन एवं विस्तार विभाग तथा सह-प्राध्यापक अर्थशास्त्र, राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय द्वारा वर्तमान समय में श्री अन्न की प्रासंगिकता और उपयोगिता पर विस्तृत चर्चा की।

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डॉ. अमिता कुशवाहा सह-प्राध्यापक, बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी द्वारा श्री अन्न के सेवन से होने वाले स्वास्थ्य लाभों की व्याख्या की और इसे वर्तमान समय में आजीविका के एक सशक्त माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया।
डॉ. ओमप्रकाश राणा छत्तीसगढ़ विश्वविद्यालय इन्होंने प्राकृतिक और वर्तमान रासायनिक खेती का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए विरासत से आज के युग की यात्रा को समझाया और पारंपरिक खेती अपनाने की पुरजोर सलाह दी। डॉ. धनाश्री माहोरे नागपुर इन्होंने दैनिक जीवन में मिलेट्स के उपयोग और शरीर के लिए आवश्यक खनिजों की पूर्ति में इसकी महत्ता पर वैज्ञानिक जानकारी साझा की। अमित कुशवाहा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय मुख्य वक्ता के रूप में इन्होंने उपस्थित जनों को अपनी दैनिक दिनचर्या और भोजन में श्री अन्न को अनिवार्य रूप से शामिल करने तथा सकारात्मक सोच के साथ समाज को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।

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