Bhooth Bangla Trailer Review:- जब भारतीय सिनेमा में कॉमेडी के सुल्तान प्रियदर्शन और खिलाड़ी अक्षय कुमार के फिर से साथ आने की खबर आई तो सिनेप्रेमियों की उम्मीदें सातवें आसमान पर थीं। ‘हेरा फेरी’, ‘भूल भुलैया’ और ‘दे दना दन’ जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में देने वाली इस जोड़ी से अपेक्षा थी कि ‘भूत बंगला’ हॉरर-कॉमेडी के जॉनर में एक नई मिसाल पेश करेगी, लेकिन क्या यह फिल्म उन उम्मीदों पर खरी उतरती है या सिर्फ यादों का एक खंडहर बनकर रह जाती है?
कहानी की रूपरेखा
फिल्म की शुरुआत मंगलपुर नामक एक काल्पनिक गांव से होती है, जहां की लोककथाओं में वधुसुर नाम के एक भयानक राक्षस का जिक्र है। यह राक्षस गांव की नई-नवेली दुल्हनों का अपहरण कर लेता है, जिससे पूरे गांव में दहशत का माहौल है। कहानी तब मोड़ लेती है जब लंदन में रह रहे अर्जुन (अक्षय कुमार), उसकी बहन मीरा (मिथिला पालकर) और उनके पिता वासुदेव (जिशू सेनगुप्ता) को पता चलता है कि उन्हें मंगलपुर में एक पुश्तैनी महल विरासत में मिला है। अर्जुन अपनी बहन की शादी इसी महल में करने की जिद पकड़ लेता है, जबकि गांव वाले इसे शापित मानते हैं। कहानी का ताना-बाना इसी महल, पुराने रहस्यों और पौराणिक मान्यताओं के इर्द-गिर्द बुना गया है। प्लॉट में देव-असुर’ की लड़ाई, प्राचीन भविष्यवाणियां और पारिवारिक निष्ठा के तत्वों को जोड़ने की कोशिश की गई है। हालांकि कहानी सुनने में जितनी दिलचस्प लगती है, परदे पर उसका 75 प्रतिशत ही मिल पाया है। कुछ हिस्सों में कहानी खिंची हुई, जानी पहचानी और बिखरी लगची है। इसका रनटाइम 2 घंटे 45 मिनट है, जिसे जाहिर तौर पर 2.15-2.20 मिनट में समेटा जा सकता था।
कहानी के पहले हाल्फ में हल्का फुल्का रहस्य और धमाकेदार कॉमेडी है। हर सीन नॉस्टैल्जिक लग सकता है। ये फिल्म आपको एक साथ प्रियदर्शन की कई शानदार फिल्मों की याद दिलाएगी, जिसमें ‘खट्टा मीठा’, ‘हंगामा’, ‘भूल भूलैया’, ‘भागम भाग’ और ‘गरम मसाला’ शामिल हैं। कई यादगार मीम मटीरियल सीन फिल्म में दोहराने की कोशिश की गई है, जो फिल्म में बोरिंग नहीं लगते, बल्कि दोबारा पुराने वाले अंदाज में ही हंसाते हैं।
निर्देशन और पटकथा
प्रियदर्शन अपनी फिल्मों में सिचुएशनल कॉमेडी और किरदारों की भीड़ के बीच तालमेल बिठाने के लिए जाने जाते हैं। ‘भूत बंगला’ का पहला भाग उनके सिग्नेचर स्टाइल की याद दिलाता है। दृश्यों में सहज हास्य है और संवादों की टाइमिंग सटीक बैठती है। लोग हड़बड़ी में नजर आते हैं और केयॉस के बीच भी गुदगुदाने वाली कॉमेडी फूट रही है। निर्देशक ने शुरुआत में एक रहस्यमयी माहौल बनाने में सफलता पाई है, लेकिन जैसे ही फिल्म दूसरे भाग में प्रवेश करती है, प्रियदर्शन का नियंत्रण ढीला पड़ता दिखाई देता है। पटकथा में गहराई की कमी साफ झलकती है। फिल्म कॉमेडी से अचानक एक गंभीर थ्रिलर बनने की कोशिश करती है, लेकिन इस बदलाव में वह अपनी मौलिकता खो देती है। फ्लैशबैक दृश्यों का बार-बार उपयोग और कहानी को जरूरत से ज्यादा समझाने की कोशिश ओवर एक्सप्लेनेशन जैसा फील कराती है। इसी के चलते कहानी खिंची और ये पूरी तरह दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेती है। निर्देशन में वह पैनापन गायब है जो ‘भूल भुलैया’ के क्लाइमेक्स में देखने को मिला था।
अभिनय
अक्षय कुमार एक बार फिर साबित करते हैं कि कॉमेडी उनके डीएनए में है, लेकिन एक कमी है, वो बहुत रेपेटेटिव हैं। उनमें नएपन की कमी है और वो कुछ सीन में हड़बड़ी में लगते हैं। अर्जुन के किरदार में वह पूरी ऊर्जा के साथ नजर आते हैं, लेकिन उनकी उम्र एक बड़ी रुकावट है, वो कहीं से भी 30-35 के लड़के रोल में सेट नहीं हो रहे। उनकी कॉमिक टाइमिंग सही, लेकिन बार-बार मुंह से निकलता थूक, क्लोजअप सीन्स में हड़बड़ी को दिखा रहा। कुछ भी कहें, लेकिन उनके वन-लाइनर्स और हाव-भाव दर्शकों को बांधे रखते हैं।
सहायक कलाकारों की बात करें तो राजपाल यादव, परेश रावल और असरानी की तिकड़ी को पर्दे पर देखना सुखद है। राजपाल यादव ने एक बार फिर अपनी अद्भुत अभिनय क्षमता से छोटे-छोटे दृश्यों में भी जान फूंक दी है। परेश रावल का काम सराहनीय है, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें वह विस्तार नहीं देती जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है, लेकिन वो जब भी पर्दे पर आते हैं, पेड़ भाड़कर हंसना तय है। फिल्म देखने के बाद कौन कहेगा कि असरानी इस दुनिया में नहीं हैं, वो जिस भी सीन में अक्षय के साथ नजर आए, उन पर पूरी तरह भारी पड़े हैं। उनकी एक्टिंग साबित करती हैं कि वो सिनेमा के दिग्गज हैं और स्टेज के बादशाह।
महिला कलाकारों में मिथिला पालकर ने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। वामीका गब्बी पर्दे पर खूबसूरत लगी हैं, लेकिन उनके किरदार को ठीक से विकसित नहीं किया गया, जिससे वह कहानी में खोई-खोई सी लगती हैं। सबसे बड़ी निराशा तब्बू को लेकर होती है। तब्बू जैसी दिग्गज अभिनेत्री को इस फिल्म में पूरी तरह से व्यर्थ किया गया है। उनके किरदार में न तो कोई गहराई है और न ही उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का पर्याप्त अवसर मिला। जिशू सेनगुप्ता और अक्षय कुमार के बीच उम्र के अंतर के बावजूद उन्हें पिता-पुत्र दिखाना एक ऐसा कास्टिंग चुनाव है जो तर्क से परे लगता है। जीशू जैसे दमदार एक्टर भले ही अपने रोल में प्रभाव छोड़े हों, लेकिन वो कहीं से भी अक्षय के पिता नहीं लग रगे हैं। उनकी कास्टिंक सही नहीं बैठी है।
तकनीकी पक्ष
तकनीकी रूप से फिल्म ठीक है। फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कोई खास नहीं है, जो कानों में गूंजे और जेहन में रहे। खास बात ये है कि हॉरर फील वाला बैकग्राउंड स्कोर बहुत कमजोर है। गानों की बात करें तो ‘राम जी आके भला करेंगे’ के अलावा कोई भी गीत याद रखने लायक नहीं है। ‘अमी जे तोमार’ जैसे कल्ट गाने को फिर से बनाने की कोशिश पूरी तरह विफल रही है। सिनेमैटोग्राफी प्रभावी है, क्लोजअप सीन हो या फिर लॉन्ग शॉट दोनों ही कमाल हैं, जो खूबसूरती और एक्सप्रेशन को सही से दिखा रहे हैं। मंगलपुर के दृश्यों और महल की भव्यता को कैमरे में अच्छे से कैद किया गया है, लेकिन वीएफएक्स और प्रोस्थेटिक्स के मामले में फिल्म मात खा जाती है। राक्षस का लुक अक्षय कुमार के ‘2.0’ वाले अवतार से प्रेरित लगता है, जो डरावना नहीं लगता। फिल्म की एडिटिंग पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता थी, क्योंकि दूसरा भाग काफी खींचा हुआ और थकाऊ महसूस होता है।
क्या है इस फिल्म की फ्लॉलेस खूबी?
अगर फिल्म के सबसे मजबूत पक्ष की बात करें तो वह है इसका पहला भाग और अक्षय कुमार की टोली का कॉमिक प्रेजेंस। फिल्म की शुरुआत बहुत ही उम्मीद जगाने वाली है। प्रियदर्शन ने शुरुआत के 45 मिनटों में जिस तरह से हंसी का माहौल बनाया है, वह काबिले तारीफ है। संवादों में वही पुराना प्रियदर्शन टच है जो हमें 2000 के दशक की फिल्मों की याद दिलाता है। अक्षय, परेश और राजपाल के बीच की केमिस्ट्री आज भी वैसी ही ताजा और असरदार है, जो इस फिल्म को कम से कम एक बार देखने लायक बनाती है।
कहां रह गई कमी?
‘भूत बंगला’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसका कंफ्यूज्ड टोनेलिटी है। फिल्म यह तय नहीं कर पाती कि उसे एक डरावनी फिल्म बनना है या एक शुद्ध कॉमेडी। दूसरे भाग में लोककथाओं और काले जादू के भारी-भरकम विवरण कहानी की गति को धीमा कर देते हैं। साथ ही फिल्म के कुछ हिस्से काफी दकियानूसी लगते हैं, जहां एक आधुनिक परिवेश में पली-बढ़ी लड़की बिना किसी सवाल के पुराने रीति-रिवाजों के सामने घुटने टेक देती है। क्लाइमेक्स, जिससे बहुत उम्मीदें थीं, वह काफी साधारण और प्रेडिक्टेब साबित होता है। खिंटी हुई कहानी ने बेहतरीन आईडिया को औसत दर्जे की फिल्म बनाकर छोड़ दिया।
वर्डिक्ट
‘भूत बंगला’ एक ऐसी फिल्म है जिसे आप अक्षय और प्रियदर्शन की क्लासिक फिल्मों से कंपेयर किए बिना ही देखें। यह उन लोगों के लिए एक अच्छी टाइमपास फिल्म हो सकती है जो अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की जोड़ी के पुराने प्रशंसक हैं। फिल्म में हंसी के कुछ शानदार पल हैं और अक्षय का अभिनय लाजवाब है, लेकिन यह ‘भूल भुलैया’ जैसी कल्ट फिल्म की बराबरी नहीं कर पाती। यदि आप एक उत्कृष्ट हॉरर-कॉमेडी की तलाश में हैं जो आपको डराए भी और हंसाए भी तो शायद आप थोड़े निराश होंगे, लेकिन अगर आप वीकेंड में अपने परिवार के साथ कुछ हल्के-फुल्के पल बिताना चाहते हैं और तर्क को थोड़ी देर के लिए किनारे रख सकते हैं तो ‘भूत बंगला’ के चक्कर लगाए जा सकते हैं। यह महल पूरी तरह भूतिया तो नहीं है, लेकिन इसमें मनोरंजन के कुछ पुराने कमरे अभी भी सलामत हैं

